Thursday, May 8, 2014

Faith, Fanaticism and Jihad आस्था, कट्टरता और जिहाद

काज़ी वदूद नवाज़, न्यु एज इस्लाम
22 अप्रैल, 2014
आस्था के बुनियादी तत्वों पर एक गहरी नज़र डालने पर सच्चे मुसलमान के जीवन के उद्देश्य का पता चलता है। एक मुसलमान के जीवन में पवित्र जवाबदेही होती है। एक मुसलमान का जीवन संतुलित और नैतिक निर्देशों के अनुसार होता है जिसे कुरान ने निर्धारित किया है। इस संतुलन की सीमाओं का ज़रा सा भी अतिक्रमण इस्लाम की दृष्टि में एक दंडनीय अपराध है।
एक मुसलमान की तरफ से इन तत्वों की भावनात्मक मान्यता आस्था के प्रति एक शुरआती कदम है। लेकिन ज्ञान ही आस्था के आधार को मजबूती देता है। कुरान की पहली आयत (सूरे अलक़: आयत 1 - 6) जो हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुई, वो ज्ञान हासिल करने के लिए दिव्य निर्देश हैं। कुरान में शुरू से अंत तक और हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी पूरी ज़िंदगी में मुसलमानों को ज्ञान प्राप्त करने के महत्व पर ज़ोर दिया।
अल्लामा इकबाल ने अपनी किताब "Reconstruction of Religious Thoughts in Islam" में लिखा है कि इस्लाम में तर्कसंगत आधार के खोज की शुरुआत को खुद नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के समय से शुरु माना जा सकता है। वो निरंतर ये दुआ किया करते थे: "ऐ खुदा! मुझे चीज़ों की परम प्रकृति का ज्ञान अता फरमा।" इन सभी से स्पष्ट रूप से आस्था के मामले में ज्ञान की भूमिका प्रकट होती है। 
 

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