Friday, September 9, 2011

Hindi Section
09 Sep 2011, NewAgeIslam.Com
सतही धार्मिक सोचः आत्मनिरीक्षण का समय

वारिस मज़हरी (उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

सतही धार्मिक सोचः आत्मनिरीक्षण का समय

ज़ात पात का समाजी भेदभाव इस्लाम की बुनियादी शिक्षा के खिलाफ़ है। इस्लाम इन भेदभावों कोखत्म करने, रंग, नस्ल, पेशा, ग़रीबी, अमीरी की बुनियाद पर खड़ी होने वाली गैरबराबरी की दीवारको ढहाने के लिए आया था, लेकिन इन दीवारों ने जिन पर मध्यकाल में सामंती व्यवस्था कीइमारत खड़ी की गयी थी, मुस्लिम समाज को ज़ात-पात, बिरादरी और क़बीले के नाम पर इतनेहिस्सों में बाँट दिया है कि मुसलमानों का समाजी वजूद बिल्कुल बिखर कर रह गया। मस्जिदों कीगैर-ज़रूरी तामीर (निर्माण) सजावट पर खर्च ने एक रुझान की शक्ल अख्तियार कर ली है।मस्जिदों को सादा और कुशादा (विस्तृत) होना चाहिए। इस हद तक मज़बूती भी कि किसी तरह केखतरे का अंदेशा हो, लेकिन इस वक्त जो शानदार मस्जिदें बन रही हैं उनमें महज़ मज़हबी जोश हीनज़र आता है। इसलिए इनकी तामीर सजावट में जो लोग सबसे ज़्यादा माली मदद करते हैं, बल्कि कहना चाहिएकि जिनके बुलंद हौसलों की बुनियाद पर मस्जिद की बुलंद इमारत खड़ी की जाती है, वो नमाज़ और ज़हब पर अमलके दूसरे मामले में सबसे ज़्यादा पीछे होते हैं। --वारिस मज़हरी (उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एजइस्लाम डाट काम)

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