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उरूजे आदमे ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
मौलाना नदीमुल वाजिदी
18 जून, 2012
(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
इसरा और मेराज ये दो लफ़्ज़ एक हैरतअंगेज़ वाक़ए की तरफ़ इशारा करते हैं जो बअस्ते नब्वी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ग्यारहवीं साल में पेश आया, क़ुराने करीम में इस वाक़ए का ज़िक्र इस आयते करीमा में किया गया है: पाक है वो ज़ात जो अपने बंदे (मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को) रात के वक़्त मस्जिदे हराम से मस्जिद अक़्सा तक ले गया (बनी इसराईलः 1)
इस आयत में एक ऐसा मुहैय्यरुल उकूल वाक़ेआ बयान किया गया है जो तारीख़े इंसानी में ना पहले कभी पेश आया और ना आइन्दा कभी पेश आएगा, सीरते नब्वी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मामूली वाक़फ़ियत रखने वाले लोग भी जानते हैं कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की मक्की ज़िंदगी सख़्त मसाइब व आलाम में गुज़री है, कोई ज़ुल्म ऐसा ना था जो मुशरिकीन मक्का ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम पर और आप के जाँनिसार सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा पर ना ढाया हो, अख़ीर में जब कोई बस ना चला तो उन मुशरिकीन ने बनू हाशिम और बनू अब्दुल मुत्तलिब के ख़िलाफ़ आपस में ये मुआहिदा कर लिया कि इन क़बीलों से उस वक़्त तक किसी किस्म का कोई ताल्लुक़, कोई राबिता, कोई मुआमला नहीं रखा जाय जब तक कि वो सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को क़त्ल करके हमारे हवाले नहीं करेंगे। इस मुआहिदे के नतीजे में इन दोनों क़बीलों के तमाम अफ़राद (अबूलहब के अलावा कि वो मुशरिकीन के साथ था) शोएब अबी तालिब में महसूर होकर रह गए, हालात इंतेहाई ना गुफ़्ता बा थे, इस मुआहिदे के नतीजे में सामान ख़ुर्दो नोश की आमद मुअत्तल हो गई, लोग पत्ते और चमड़े के टुकड़े खाने पर मजबूर हो गए, भूक से बिलबिलाते हुए बच्चों और औरतों की आवाज़ें घाटी से बाहर तक सुनाई देती थीं, ये मुआमला पूरे तीन साल तक चला, नबुव्वत के दसवें साल ये मुआहिदा जो ख़ानए काबा की दीवार पर आवेज़ां था अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ कीड़ों के ज़रीये साफ़ कर दिया गया, क़ुरैश के बाज़ दूसरे क़बीलों के सरकरदा अफ़राद ने भी इस ज़ुल्म से तौबा कर ली और उनके दिल भी महसूरीन के लिए नरम पड़ गए, इस तरह सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और आपके घर वाले, दोस्त अहबाब जाँनिसार सहाबा रज़ियल्लाहू अन्हा और अज़ीज़ अका़रिब शोएब अबी तालिब से बाहर आए, इस वाक़ेआ के छः माह बाद आप के चचा अबू तालिब वफ़ात पा गए, जिनसे आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को कारे अदावत में बड़ी तक़वियत हासिल थी, इस हादसे के चंद रोज़ बाद उम्मुल मोमिनीन हज़रत ख़दीजा अलकुबरा रज़ियल्लाहू अन्हुमा वफ़ात पा गईं जो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की बड़ी ग़मगुसार थीं, इन मुसलसल हवादिस ने आप को निढाल कर दिया, मगर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम इन हालात में भी दावते दीन की ज़िम्मेदारी अदा करते रहे। मुशरिकीन मक्का से मायूस होकर आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ताइफ का रुख किया, ये शहर मक्का मुकर्रमा से साठ मील की मुसाफ़त पर वाक़े है, आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने इस सफ़र के दौरान हर क़बीले को दावते इस्लाम दी, लेकिन किसी ने भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ये दावत क़ुबूल ना की, इसके बजाय उन लोगों ने आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को शहर से बाहर निकालने के लिए आवारा लड़कों को पीछे लगा दिया, ये बदनसीब लड़के आप पर आवाज़े कसते और पत्थर बरसाते पीछे पीछे चल रहे थे, यहां तक कि आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के दोनों जूते जिस्म के ख़ून से रंगीन हो गए थे।
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