पसमांदगी के तोक़ से आज़ाद कराने के लिए, मुस्लिम तब्क़े के रहनुमाओं को हाईकोर्ट के फ़ैसले पर सवाल करना चाहीए जो 15 साला लड़की की शादी को जायज़ ठहराता है।
9 मई को जब दिल्ली हाईकोर्ट ने अजीबो ग़रीब और रुजअत पसंदाना फ़ैसले दिया था जिसमें कहा था कि 15 साला मुस्लिम लड़की की शादी क़ानूनी थी, उस वक़्त ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (AIMPLB) इस फ़ैसले का इस्तक़बाल करने वालों में पहला था। अगर एक लड़की जिसे स्कूल जाना चाहिए और ज़िंदगी के लिए ज़रूरी हुनरमंदी सीखना चाहिए, इसके बजाय अगर उसे पहले ही हैज़ के वक़्त शादी के बंधन में बांध दिया जाय ताकि वो बच्चा पैदा करने की अपनी सलाहियत के लिए इसका इस्तेमाल कर सके और ये AIMPLB में जोश पैदा करता है, तो क्या उन्हें मुसलमानों की पसमांदगी की शिकायत करने का हक़ है?
ये क़ाबिले बहस है कि 15 साल और 10 माह की उम्र बहुत कम नहीं होती है, इसे मद्दे नज़र रखते हुए कि कई लड़कियाँ इस उम्र तक पहुंचते ही जिन्सी तौर पर फ़आल हो जाती हैं। लेकिन फ़ैसले का बग़ौर मुताला करने पर पता चलता है कि, एक मुसलमान लड़की कब क़ानूनी तौर पर शादी कर सकती है, अदालत ने उम्र को बेंच मार्क नहीं बनाया, बल्कि जब किसी लड़की को हैज़ के अय्याम शुरू होते हैं और दीगर जिस्मानी तब्दीलियाँ वाक़े होती हैं, इन्हें शादी की उम्र का ताय्युन करने का अंसर माना है। जैसे एक पालतू जानवर जिसे हम बाख़ुशी इजमा के लिए उसकी ज़रूरत के मौक़ पर भेजते हैं। ये बुरा लगता है? और ये है।
ये बिल्कुल वैसा ही है जिस तरफ़ हाईकोर्ट का फ़ैसला ले जा सकता है, जो तहज़ीबी नसबतियत के नाम पर तज्वीज़ करता है कि मोहम्मडन ला के मुताबिक़, अगर एक लड़की सने बलोग़त को पहुंच चुकी है तो वो अपने वालदैन की मर्ज़ी के बगै़र शादी कर सकती है और यहां तक कि अगर उस की उम्र 18 साल से कम है तो भी उसे अपने शौहर के साथ रहने का हक़ है।
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