Tuesday, May 6, 2014

Life between Grieves सदमों के बीच ज़िंदगी





मुजाहिद हुसैन, न्यु एज इस्लाम
29 अप्रैल, 2014
पाकिस्तान को एक दिलचस्प स्थिति का सामना है और कई बुज़ुर्ग करार दिए गए बुद्धिजीवी और साज़िश करने वाले तत्वों की बू को दूर से सूँघ लेने में माहिर लोग आपस में गुत्थम गुत्था हैं। जियो टेलीविजन के एंकर हामिद मीर पर हमले को लेकर न सिर्फ मुल्क में राजनीतिक उत्तेजना छाई नज़र आ रही है बल्कि पत्रकारिता और राज्य सहित राज्य के संस्थानों के बारे में दोबारा से परिभाषा तय करने के प्रयास जारी हैं। मैं बहुत ज़ोर से हँसना चाहता हूँ और इसकी वजह ये है कि कहीं भी कोई भी गंभीर और वस्तुनिष्ठता का तलबगार नहीं। जहां राज्य की अमलदारी की रूप रेखा स्पष्ट न हों वहाँ अक्सर संस्थाएं, व्यक्ति और समूह सभी प्रकार के फैसले और कदम खुद ही उठा लेते हैं और एक समय आता है कि राज्य तबाह हो जाता है और शक्तिशाली लोग ही राज्य का रूप धर लेते हैं।
ये बिल्कुल समझ में आने वाली और पाकिस्तान में सामान्य घटना है कि एक मशहूर पत्रकार की हत्या करने की कोशिश की गई है। अगर हम हामिद मीर की महानता के बयान को थोड़ी देर के लिए थाम लें तो ऐसी घटनाएं हमारे यहाँ बहुत ज़्यादा हुई हैं और अज्ञात अवधि तक होते रहने की स्पष्ट संभावना है। पूर्व प्रधानमंत्री, सेना के जनरल, उलमा, डॉक्टर, वैज्ञानिक, ब्युरोक्रैट्स यहाँ तक कि जीवन के हर क्षेत्र से जुड़े सफल और प्रसिद्ध लोग लाचारी की हालत में पाकिस्तान की सड़कों और गलियों में मारे गए हैं। अल्पसंख्यकों के सैकड़ों लोगों की कुछ ही क्षणों में हत्या कर दी गयी लेकिन पाकिस्तान के स्पष्ट रूप से बहुत अधिक स्वतंत्र मीडिया पर सिवाय सामान्य खबरों के इन घटनाओं की ज्यादा चर्चा नहीं हुई। और न ही ये बहस हो सकी है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम कैसे संभव है। इस प्रकार की चर्चा के तो हम कभी लायक ही नहीं कर सके कि इस तरह की घटनाओं का स्रोत क्या है और हम एक समाज के रूप में किस दिशा में जा रहे हैं?
 

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